Meri Dukhi Chachi Lajwanti

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Dilwala Rahul 2016-09-04 Comments

Hindi Sex Stories

नमस्कार सभी भोसडीवाले भाईयों और रंडियों.

मेरा नाम संजीव है. मेरा गाँव मेघालय में है जहाँ मेरी कामुक चाची और चाचा व उनका एक पुत्र रहता है और जब मैं 22 वर्ष का हुआ तो पहली बार गाँव देखने और भ्रमण करने की जिज्ञासा हुयी तो ग्रीष्मावकाश के समय मेने दिल्ली से मेघालय प्रस्थान किया, सुबह 7 बजे मेघालय बस स्टैंड पहुचने पर मैंने वहां से अपने गाँव के लिए लोकल बस पकड़ी और 9 बजे अपने गाँव पहुच गया. हरे भरे घने जंगलों के बीच, स्वच्छ वातावरण के मध्य मेरा गाँव मुझे भा गया.

सेक्सी मौसम, हरियाली, और प्रदूषण रहित गाँव देखकर मुझे यकीन नहीं हुआ कि मैं इसी दुनिया में हूँ. दिल्ली के गर्मी भरे, प्रदूषण से लबालब हुए मौसम की तुलना में गाँव का मौसम हजार गुना बेहतर था. मैं अपने पुराने घर में पहुंचा जहाँ मेरी 38 वर्षीय चाची, लाजवंती और 45 वर्षीय दिमाग से पागल चाचा, सुखीराम अपने 15 वर्षीय पुत्र, आदर्श के साथ जीवनयापन कर रहे थे. गाँव में यह बात प्रचलित है कि जंगल में एक डायन रहती है उसने चाचा की ये दुर्दशा की है.

वैसे मेरी और चाची की व्हाटसएप पर बात होती रहती है, परंतु आज गाँव में सजीव देखने का अवसर मिला. मेरी चाची दूध की तरह एक गोरी चिट्टी व थोड़ा मोटी-सुडौल औरत है. गाँव की वेशभूषा उसके मादक शरीर पर काफी जच रही थी.

चाची का काम-वासना के लिए तड़पता बदन और चेहरे पर चुदने की आकांक्षा स्पष्ट प्रतीत हो रही थी. चाची की ऐसी हरी भरी जवानी में पागल चाचा ने एक प्रकार से चाची का चुदाई साथ छोड़ ही दिया था और अब चुदाई सुख से वंचित मेरी चाची का सहारा केवल गाजर, मूली, शलजम, लौकी, करेला, केला, बैंगन व अन्य प्रकार की सब्जियां व नाना प्रकार के फल ही रह गए थे.

चाची के उभरे हुए सख्त उरोज तथा उसमे चमकते काले निप्पल, बड़ा गोरा पेट, मोटी गांड, व फूली हुयी झाँटों से भरी चूत उसकी सुंदरता और कामुक शरीर का भली भांति परिचय दे रहे थे व उसमें चार चांद लगा रहे थे. चाची के लंबे घने काले बाल उसके नितम्बों को पूरी तरह से ढक रहे थे, बड़े बड़े होंठ, बड़ी बड़ी डब्बे जैसी आँखें ऐसी प्रतीत होती है कि किसी भी बूढ़े या नपुंसक का लण्ड भी हिचकोले खाने लगे.

वहीँ दूसरी ओर पागल चाचा, जिसका नाम तो सुखीराम है परंतु चाची के जवानी भरे सुखी जीवन में दुःख भर दिया है, सुबह से शाम तक कुर्सी पर बैठा रहता है, दिन-दुनिया का कुछ पता नहीं कि क्या चल रहा है. पागलों की तरह जंगल में देखते रहता है. चाची का बेटा आदर्श स्कूल गया हुआ है जो दोपहर 2 बजे बाद ही घर आता है. यह कहानी आप देसी कहानी डॉट नेट पर पढ़ रहे हैं।

मुझे चाचा के पागल होने की वजह को जानने की जिज्ञासा होने लगी. मैं इस चूतियापे भरी घटना के बारे में जानना चाहता था.

मैं- चाची, मुझे जंगल में जाना है, देखना है कि वहां ऐसा क्या था कि चाचा पागल हो गया.

चाची- नहीं संजीव, तू नहीं जा सकता, वहां कोई भी नहीं जाता है, और जो जाता है या तो वो कभी लौट कर नहीं आता या तेरे चाचा की तरह पागल हो जाता है.

मैं- ये सब अंधविश्वास है चाची, मैं एक दिन जाकर जरूर पता लगाऊंगा कि क्या राज़ है.

चाची- प्लीज संजीव, मत जाना, तुझे मेरी कसम, अब तेरे सिवा मेरा इस दुनिया में और कौन है, तेरे चाचा तो अब मुर्दे के समान हैं, मेरी तो जिंदगी बर्बाद हो गयी, मैंने इन्हें मना भी किया था कि मत जाओ, मत जाओ, लेकिन यह नहीं माने.

मैं- अरे चाची, काहे घबराती हो, मैं चाचा के जैसे रात में थोड़े ही जाऊंगा, दिन मैं जाऊंगा. मैं हमेशा तेरे साथ रहूँगा, तुझे कभी नहीं छोड़ूंगा.

चाची- मेरा राजा भतीजा, कितना सुन्दर और बड़ा हो गया है तू, किसी की नजर न लगे तुझे.

(और फिर चाची मेरे सीने से लग जाती है और हम दोनों कुछ देर ऐसे ही एक दूसरे से चिपके रहते हैं, मेरी ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था, मेरे बदन में अजीब सी सुरसुरी हो गयी,

जिस वजह से मेरे लण्ड पर दबाव पड़ता है और वो चाची के बदन स्पर्श से खड़ा हो जाता है और चाची के पेट पर झटके मारता है और चाची को चुभने लगता है. जब चाची को मेरे लण्ड-दबाव का आभास होता है तो वो मुझ से अलग हो जाती है और शैतानी, कमीनेपन और कामुकता से भरी मुस्कान देती है,

नाश्ता करने के बाद मैं चाची के कमरे में जाता हूं)

चाची- और सुना भतीजे, दिल्ली में क्या चल रहा है.

मैं- बस चाची, आजकल तो टाइम पास हो रहा है, तेरी याद आती है दिल्ली में.

चाची- चल हट बदमाश, चाची से मजाक करता है.

मैं- मजाक नही है चाची, तेरी कसम, रात को सोते वक्त तेरी याद आती है दिल्ली में.

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